यह एक बहुत ही दर्दनाक और विचलित करने वाली घटना है। गुरुग्राम (Gurugram) में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे एक जोड़े के बीच का यह विवाद अपराध की सारी हदें पार कर गया।
यह घटना गुरुग्राम के अर्जुन नगर इलाके की है। मामला: एक 25 वर्षीय युवक अपनी लिव-इन पार्टनर (महिला) के साथ रह रहा था। दोनों के बीच किसी बात को लेकर तीखी बहस हुई। क्रूरता: विवाद इतना बढ़ गया कि युवक ने गुस्से में आकर महिला के प्राइवेट पार्ट्स पर ज्वलनशील पदार्थ (संभवतः थिनर या पेट्रोल) डालकर आग लगा दी।
मामले में अब क्या हो रहा है
महिला को गंभीर हालत में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वह काफी ज्यादा झुलस गई है और उसकी स्थिति नाजुक बनी हुई है। पुलिस ने पीड़िता के बयान के आधार पर आरोपी युवक के खिलाफ IPC (या नए कानून BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले लिया है और मामले की गहन जांच की जा रही है कि विवाद की असली वजह क्या थी।
UGC New Regulations : यूजीसी के नए नियम में समर्थन और विरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट ने आज रोक लगा दी. इतना ही नहीं नया इक्विटी रेगुलेशंस क्या भारतीय संविधान के विपरीत है? इस बात की जांच अब सुप्रीम कोर्ट करेगा. सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कुछ अपीलकर्ताओं ने यह शिकायत दर्ज कराई थी कि यूजीसी के नये नियम सामान्य जाति के खिलाफ हैं, उन अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने फिलहाल नये नियमों पर रोक लगा दी है और 2012 के नियमों को ही जारी रखा है.
UGC New Regulations : यूजीसी के नए नियम पर सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल प्रभाव से रोक लगाया और कहा है कि फिलहाल 2012 के नियम ही प्रभाव में रहेंगे. इतना ही नहीं कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि नियमों में कुछ अस्पष्टता है जिसकी वजह से इसका बेजा इस्तेमाल हो सकता है. सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूरे मामले की सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख तय किया है.
नये नियमों पर क्या थी आपत्ति?
यूजीसी के नये नियमों पर सामान्य जाति के लोगों ने आपत्ति जताई थी और कहा था कि यह भेदभाव पूर्ण है और इसका गलत इस्तेमाल सामान्य श्रेणी के छात्रों के खिलाफ किया जा सकता है. दरअसल यूजीसी ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी की आत्महत्या के बाद संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को मिटाने के लिए नये नियम 13 जनवरी को जारी किये थे, जिसमें एससी–एसटी के साथ ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं को शामिल किया था. इस नियम का उद्देश्य हाशिए पर रहने वाले लोगों को जाति आधारित भेदभाव से बचाना था. लेकिन जेनरल कैटगरी के लोगों ने इसे भेदभाव पूर्ण बताया, क्योंकि इस नियम में गलत शिकायत दर्ज करने वालों के लिए किसी भी तरह की सजा का कोई प्रावधान नहीं किया गया है. जेनरल कैटेगरी के लोगों ने यूजीसी के नये नियमों के खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किया और इन नियमों को जेनरल कैटेगरी की प्रताड़ना का जरिया तक बताया.
यूजीसी एक्ट 2012 में खास क्या है?
यूजीसी ने 2012 में संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को मिटाने के लिए एक नया कानून बनाया था, जिसके तहत एससी–एसटी वर्ग से आने वाले लोगों को जाति आधारित भेदभाव से बचाने के लिए नियम बनाए गए थे. इस नियम का उद्देश्य अनुशासन कायम करना है, ताकि जातिगत भेदभाव ना हो. यह नियम बहुत सख्त नहीं थे और इसमें गलत शिकायत करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई और दंड का प्रावधान था.
यूजीसी के नये नियमों पर कहां हो रही है सुनवाई?
यूजीसी के नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं. मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जाॅयमाल्या बागची की बेंच सुनवाई कर रही है. यूजीसी के नये नियमों के खिलाफ मृत्युंजय तिवारी, एडवोकेट विनीत जिंदल और राहुल दीवान कोर्ट गए हैं और इन नियमों को जेनरल कैटेगरी के लोगों के खिलाफ भेदभाव पूर्ण बताया है. कोर्ट ने यह स्पष्ट कहा है कि नये नियमों पर रोक इसलिए लगाई जा रही है ताकि इसकी संवैधानिकता की जांच हो. कोर्ट इस बात को देखेगा कि क्या नये नियमों में संविधान के खिलाफ कुछ भी है या नहीं, उसके बाद ही यह नियम लागू हो पायेंगे या यह भी संभव है कि इसमें कुछ संशोधन हो.
नए नियम में सुप्रीम कोर्ट क्या जांच करेगा?
सुप्रीम कोर्ट, यूजीसी के नये नियमों की जांच करेगा और यह देखेगा कि क्या नियम जाति, धर्म और लिंग के आधार पर किसी तरह का कोई भेदभाव तो नहीं कर रहा है. इसकी वजह यह है कि संविधान में इस तरह के भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 15(5) के तहत SC/ST/OBC के लिए विशेष प्रावधान करने की स्वतंत्रता राज्य को है. सुप्रीम कोर्ट यह भी देखेगा कि नये नियम कहीं किसी खास जाति के खिलाफ भेदभाव पूर्ण तो नहीं हैं.
Budget 2025-26: संसद के बजट सत्र में फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण इकोनॉमिक सर्वे पेश करेंगी. 65 दिनों के इस सत्र के शेड्यूल से लेकर, नए बिल और देश की आर्थिक सेहत का पूरा लेखा-जोखा हमने आपके सामने लाने की कोशिश की है.
Economic Survey: भारतीय पॉलिटिक्स और इकॉनमी के लिए एक बड़ा दिन है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 पेश करने वाली हैं. बीते साल हमारे देश की कमाई और खर्च का हिसाब-किताब पर आधारित यह डॉक्यूमेंट हमें बताता है कि बीता साल कैसा रहा और आने वाले साल में हमारी इकोनॉमी किस दिशा में जाने वाली है. चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर की देखरेख में तैयार यह डॉक्यूमेंट देश की फाइनेंशियल हेल्थ का असली आईना होता है.
संसद में सबसे पहले क्या ?
दिन की शुरुआत क्वेश्चन ऑवर यानी प्रश्नकाल से होगी, जहां सांसद अपनी बात रखेंगे और मंत्रियों से तीखे सवाल पूछेंगे. इसके बाद मंत्रियों द्वारा जरूरी कागजात सदन के सामने रखे जाएंगे. निर्मला सीतारमण फाइनेंस मिनिस्ट्री से जुड़े पेपर्स पेश करेंगी, तो वहीं मिनिस्टर ऑफ स्टेट फॉर सिविल एविएशन मुरलीधर मोहोल एयरपोर्ट अथॉरिटी (AERA) की वर्किंग रिपोर्ट और उससे जुड़े डॉक्यूमेंट्स टेबल करेंगे.
कुछ नए कानून भी सामने आएंगे
आज एक बहुत ही जरूरी काम होने वाला है. संसद के पिछले सेशन में जो आठ बिल पास हुए थे और जिन पर राष्ट्रपति की मुहर लग चुकी है, उन्हें आज फॉर्मली सदन के सामने रखा जाएगा. इसके अलावा, बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की 13वीं रिपोर्ट भी किरण रिजिजू और कोडिकुनिल सुरेश द्वारा पेश की जाएगी. साथ ही, ‘रूल 377’ के तहत सांसद उन मुद्दों को उठाएंगे जो जनता के लिए बहुत जरूरी हैं.
क्या है बजट सत्र का पूरा प्लान ? यह बजट सत्र कल ही शुरू हुआ है और यह काफी लंबा चलने वाला है. कुल 65 दिनों के इस सफर में 30 बैठकें होंगी और यह 2 अप्रैल को खत्म होगा. बीच में 13 फरवरी से 9 मार्च तक ब्रेक भी रहेगा ताकि कमेटियां बजट की बारीकियों को अच्छे से चेक कर सकें.
Plane Crash : बुधवार की सुबह भरतीय राजनीती में दुखद सुचना लेकर आई. महारास्ट्र की राजनीती में अपने दम पर अपना लोहा मनवाने वाले अजित पंवार नहीं रहे. सुबह एक विमान दुर्घटना में पंवार समेत ६ लोगों की दर्दनाक मौत हो गयी. महाराष्ट्र की राजनीति का एक ऐसा सितारा जिसकी तूती बोलती थी और उन्होंने अपनी यह जगह मेहनत और संघर्ष से बनाई थी. भारतीय राजनीति के दिग्गज शरद पवार के भतीजे होने के बावजूद उन्होंने कभी भी उनकी पहुंच का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए नहीं किया. अजित पवार ने महाराष्ट्र की राजनीति में खुद को गढ़ा था. अजीत पवार का आकस्मिक निधन उन अनगिनत दुखद घटनाओं की याद दिलाता है, जिनमें हवाई हादसों ने देश के प्रभावशाली नेतृत्व को असमय ही हमसे छीन लिया. आइए, एक नजर डालते हैं भारतीय राजनीति के उन चेहरों पर, जो दुर्घटना में मारे गए.
Plane Crash: महाराष्ट्र की राजनीति के लिए आज का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है. राज्य के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता अजित पवार का बुधवार सुबह बारामती में एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया. वे 66 वर्ष के थे. यह हादसा सुबह करीब 8:45 बजे हुआ, जब उनका चार्टर्ड प्लेन (लियरजेट 45) बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिंग की कोशिश कर रहा था. शुरुआती खबरों के मुताबिक, विमान रनवे से फिसलकर क्रैश हो गया. नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने पुष्टि की है कि इस दुखद घटना में अजित पवार समेत विमान में सवार सभी 5 लोगों की मौत हो गई है, जिनमें उनके निजी सुरक्षा अधिकारी और दो चालक दल के सदस्य शामिल थे.
देश के वे नेता, जो दुर्घटना में मारे गए
अजित पवार का आकस्मिक निधन उन अनगिनत दुखद घटनाओं की याद दिलाता है, जिनमें हवाई हादसों ने देश के प्रभावशाली नेतृत्व को असमय ही हमसे छीन लिया. आइए, एक नजर डालते हैं भारतीय राजनीति के उन चेहरों पर, जिनका निधन हवाई हादसों से हुआ
गोपीनाथ मुंडे
तारीख: 3 जून 2014 निधन: सड़क हादसे (कार क्रैश) में मौत पार्टी: भारतीय जनता पार्टी (BJP) पद: महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री और केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्री
संजय गांधी
तारीख: 23 जून 1980 निधन: दिल्ली में सफदरजंग एयरपोर्ट के पास प्लेन हादसे में पार्टी: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
माधवराव सिंधिया
तारीख: 30 सितंबर 2001 निधन: चार्टर्ड प्लेन क्रैश होने से मौत पार्टी: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पद: पूर्व सिविल एविएशन मंत्री और वरिष्ठ नेता
जी.एम.सी. बालयोगी
तारीख: 3 मार्च 2002 निधन: खराब विजिबिलिटी के कारण हेलीकॉप्टर क्रैश होने से मौत जगह: आंध्र प्रदेश (कृष्णा जिले में एक तालाब में क्रैश) पार्टी: तेलुगु देशम पार्टी (TDP) पद: तत्कालीन लोकसभा स्पीकर
वाई.एस. राजशेखर रेड्डी
तारीख: 2 सितंबर 2009 निधन: हेलीकॉप्टर क्रैश होने से मौत पार्टी: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पद: तत्कालीन आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री
भाजपा नेता और लोकसभा सांसद मनोज तिवारी ने जातिगत भेदभाव को रोकने की वकालत की है। अपने फेसबुक पेज़ पर उन्होंने लिखा कि भेदभाव को एकजुटता से रोका जाना चाहिए। ये काम साफ नियत से करना चाहिए, सियासी उल्लू सीधा करने के लिए नहीं। और नियम जाति के महीन पिरामिड को समझते हुए बनाए जाने चाहिए।
आपसी रंजिश में फंसाने वाले पर हो कार्रवाई
उन्होंने सुझाव दिया कहा कि सवर्ण छात्र अगर जातिगत भेदभाव करते हैं तो उनपर कार्रवाई हो,मगर उन्हें आपसी रंजिश में फँसाया जाए तो फँसाने वाले पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। क़ानून का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए। अगर कोई OBC वर्ग का छात्र SC/ST वर्ग से भेदभाव करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान क्यों नहीं है? भेदभाव के मामले तो यहां भी होते हैं। मनोज तिवारी ने सवाल करते हुए पूछा कि नए नियमों में OBC वर्ग को भी पीड़ित पक्ष में रखा गया है, तो क्या Gen वर्ग को पहले से ही दोषी मान लिया गया है?
देश के लिए नासूर है जातिगत भेदभाव
तिवारी ने आगे लिखा कि जातिगत भेदभाव देश के लिए नासूर है। ऐसे मामलों में दोषी के खिलाफ सख़्त सजा का प्रावधान होना चाहिए,मगर निर्दोष को बचने का अवसर भी मिलना चाहिए। 2012 में बने नियम में था कि अगर आरोप ग़लत निकले या फँसाने की मंशा निकली तो जुर्माना लगता था। नए नियम में क्यों नहीं है?
हर जाति अपने से छोटी जाती खोज रही
सांसद ने लिखा कि बाक़ी जाति का पिरामिड समझना है तो नियम बनाने वालों को गाँव में घूमकर समझना चाहिए। एसी कमरों में सिर्फ़ हवा ठंडी लगती है,जातिगत गर्माहट नहीं पता लगती।
अंत में- परसाई जी,सच लिख गए हैं। इस देश में हर जाति ने अपने से छोटी जाति खोज रखी है।
Yogi Adityanath: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लव जिहाद पर फ़िर से अपने संकल्प को दोहराया है कहा- बेटियों के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे. उन्होंने लव जिहाद, धर्मांतरण और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को लेकर भी चेतावनी दी है.
Yogi Adityanath: सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने आमजन को लव जिहाद पर चेताया और कहा- समाज को जागरूक रहना होगा और इन साजिशों के खिलाफ संत समाज को भी आगे आना होगा. मुख्यमंत्री हरियाणा के सोनीपत जिले के मुरथल स्थित बाबा नागे वाला धाम में नाथ संप्रदाय के मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा और आठ मान के भव्य भंडारा कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.
धर्म की आड़ में सनातन धर्म को किया जा रहा कमजोर
सीएम योगी ने कहा कि धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने वाले कई कालनेमि सक्रिय हैं, जिनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि एक योगी, संत या संन्यासी के लिए धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं होता. धर्म ही उसकी संपत्ति और राष्ट्र ही उसका स्वाभिमान होता है. यदि कोई राष्ट्र के स्वाभिमान को चुनौती देता है, तो उसके विरुद्ध खड़ा होना ही सनातन परंपरा का धर्म है. उन्होंने कहा कि डेमोग्राफी बदलने की साजिश, अवैध धर्मांतरण और लव जिहाद के नाम पर हो रहे गलत कामों को पूरी शक्ति और जागरूकता के साथ रोका जाएगा. 2009 में केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आज देश के कई राज्यों में इसी प्रकार के संगठित षड्यंत्र दिखाई दे रहे हैं. संयुक्त परिवार की परंपरा कमजोर हो रही है, जिसे फिर से जिंदा करना जरूरी है.
सनातन, राष्ट्र और समाज एक-दूसरे से अलग नहीं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि धर्म केवल उपासना पद्धति नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग है. नाथ पंथ भारत की पुरानी आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जिसने सदैव समाज को जोड़ने और राष्ट्र को दिशा देने का काम किया है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक भारत-श्रेष्ठ भारत की कल्पना साकार हो रही है. आजादी के अमृत काल में भारत फिर से अपने वैभव की ओर अग्रसर है. सनातन धर्म मजबूत होगा तो विश्व मानवता के कल्याण का मार्ग भी मजबूत होगा.
आस्था, विकास और सुरक्षा का संगम
मुख्यमंत्री ने अयोध्या, काशी और प्रयागराज के उदाहरण देते हुए कहा कि आज धार्मिक स्थलों पर रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालु आ रहे हैं. यह सब सुरक्षित, व्यवस्थित और भयमुक्त वातावरण में हो रहा है. प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दिन साढ़े चार करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम स्नान किया, जो इसका प्रमाण है. यह संख्या कई देशों की जनसंख्या से अधिक है.
अगले एक हजार साल भारत और सनातन धर्म के
सीएम योगी ने कहा- अगले एक हजार साल भारत और सनातन धर्म के होंगे. इसके लिए सभी को मिलकर कार्य करना होगा. युवाओं को नशे से बचाना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है. सीमा पार से आने वाला ड्रग देश को कमजोर करने की साजिश है. समाज को इसके विरुद्ध संगठित होकर खड़ा होना होगा. मुख्यमंत्री ने जल संरक्षण, नदियों की पवित्रता और सरस्वती नदी के पुनर्जीवन प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि प्रकृति संरक्षण भी सनातन चेतना का अभिन्न अंग है. कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हवन-आरती की और आयोजकों को सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं दीं. कार्यक्रम में संत समाज, जनप्रतिनिधियों और देशभर से आए श्रद्धालुओं की बड़ी उपस्थिति रही.
मुंबई की जमीन पर बिहार भवन बनेगा बनाए जाने के प्रस्ताव को महाराष्ट्र और बिहार सरकार धरातल पर लाने की कोशिश में हैं लेकिन अब इस पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं वज़ह हैं मनसे प्रमुख राज ठाकरे। राज ठाकरे ने बिहार भवन पर धमकी देकर दो राज्यों की राजनीति को आमने-सामने ला खड़ा किया है. न केवल मनसे बल्कि शिवसेना के विरोध ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। वहीं जदयू और भाजपा ने साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र में हर हाल में बिहार भवन बनेगा.
देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में बिहार भवन के निर्माण को लेकर राजनीतिक टकराव तेज हो गया है. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना(उद्धव) ने इस प्रोजेक्ट का खुलकर विरोध करते हुए कहा है कि वे बिहार भवन नहीं बनने देंगे. इसके जवाब में जदयू और भाजपा ने दोनों दलों पर तीखा हमला बोला है और चेताया है कि हुल्लड़बाजी छोड़कर शांत रहें, क्योंकि मुंबई में बिहार भवन बनकर रहेगा. बिहार सरकार की इस प्रोजेक्ट ने अब स्थानीय राजनीति और केंद्र-राज्य व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
बिहार भवन के विरोध में मनसे-शिवसेना
मनसे नेता यशवंत किल्लेदार ने कहा कि बिहार सरकार को 314 करोड़ रुपये मुंबई में इमारत बनाने पर खर्च करने के बजाय बिहार के अस्पतालों और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना चाहिए, ताकि वहां के मरीजों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों में न जाना पड़े. उनका कहना है कि यह पैसा बिहार की जनता की बुनियादी जरूरतों पर लगना चाहिए. उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी. पार्टी नेता विनायक राउत ने बिहार भवन को लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बोझ और स्थानीय राजनीति से प्रेरित कदम बताया. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मुंबई की जमीन को हड़पने का सिलसिला शुरू हो गया है और कल को बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में गुजरात भवन भी बन सकता है. शिवसेना का तर्क है कि मुंबई पहले से ही जमीन और रिसोर्स की कमी के दबाव से जूझ रही है.
जदयू- भाजपा का पलटवार
जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने मनसे और शिवसेना के विरोध को उपद्रवी और हुल्लड़बाज राजनीति करार दिया. उन्होंने कहा कि ये दल अपने राजनीतिक फायदे के लिए संवेदनशील और सतही मुद्दों को उछालते रहते हैं. उनका साफ कहना है कि बिहार भवन का फैसला महाराष्ट्र और बिहार सरकार की आपसी सहमति से हुआ है और किसी की गीदड़ भभकी से यह परियोजना रुकेगी नहीं. वहीं भाजपा ने इस विरोध को संकीर्ण सोच और स्थानीय राजनीति का उदाहरण बताया. प्रदेश प्रवक्ता प्रभाकर मिश्र ने कहा कि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है और यहां बिहार भवन का निर्माण बिहार के श्रमिकों, छात्रों और कारोबारियों के लिए बेहद उपयोगी होगा. उन्होंने कहा कि भाजपा एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना में विश्वास करती है और इस तरह की सकारात्मक पहल को निगेटिव राजनीति नहीं रोक सकती.
कैंसर मरीजों के लिए बड़ी सुविधा
बिहार भवन दक्षिण मुंबई के एलफिंस्टन एस्टेट में, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की जमीन पर बनेगा. इसके लिए बिहार सरकार ने 314.20 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति दी है. यह 30 मंजिला इमारत होगी, जिसमें कैंसर मरीजों और उनके परिजनों के लिए 240 बेड की डॉरमेट्री बनाई जाएगी. बिहार फाउंडेशन (मुंबई) के अध्यक्ष कैसर खालिद के अनुसार, यह भवन बिहार में उद्योग और निवेश को बढ़ावा देने की योजनाओं का भी केंद्र बनेगा. भवन निर्माण विभाग के सचिव कुमार रवि ने बताया कि इमारत में एसटीपी, ग्रीन एरिया और सोलर पैनल जैसी आधुनिक सुविधाएं होंगी, जिससे यह पर्यावरण के अनुकूल होगी. बिहार सरकार का कहना है कि दिल्ली, यूपी, तमिलनाडु, तेलंगाना और गुजरात की तरह मुंबई का बिहार भवन भी सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में काम करेगा.
महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव 2026 में भाजपा ने 29 महानगरपालिकाओं में जबरदस्त जीत दर्ज की. बीएमसी से ठाकरे परिवार का 30 साल पुराना वर्चस्व खत्म हुआ. पुणे, नागपुर, नासिक और संभाजीनगर में भी भाजपा का दबदबा कायम रहा. इस चुनाव में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की रणनीति ने महायुति गठबंधन को सफलता दिलाई. महाराष्ट्र में 2026 के नगर निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शानदार जीत दर्ज की है. राज्य की 29 महानगरपालिकाओं की कुल 2,869 सीटों में से भाजपा ने 1,425 सीटों पर कब्जा जमाया है. इस जीत के साथ ही भाजपा ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) से उद्धव ठाकरे का नियंत्रण भी छीन लिया है. इसके साथ देश के सबसे अमीर नगर निकाय में ठाकरे परिवार का करीब तीस साल पुराना वर्चस्व खत्म हो गया.
बीएमसी की 227 सीटों में से भाजपा ने 89 सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी शिवसेना को 29 सीटें मिलीं. शिवसेना (उबाठा) को 65, मनसे को छह सीटें मिलीं. वीबीए के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस को 24 सीटें, एआईएमआईएम को आठ, एनसीपी को तीन, समाजवादी पार्टी को दो और राकांपा (शप) को सिर्फ एक सीट मिली.
पुणे, नागपुर, नासिक और संभाजीनगर में भी भाजपा का दबदबा
पुणे नगर निगम चुनाव में भाजपा ने पवार परिवार को बड़ा झटका दिया. यहां भाजपा ने 119 सीटें जीत लीं. अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी 27 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि उसकी सहयोगी एनसीपी (शरद पवार) को तीन सीटें मिलीं. कांग्रेस को यहां सिर्फ 15 सीटें ही मिल सकीं. नागपुर की 151 सदस्यीय महानगरपालिका में भाजपा का दबदबा साफ दिखा और पार्टी ने 102 सीटें जीत लीं, जबकि कांग्रेस को 34 सीटें मिलीं. नासिक में भाजपा को 72 सीटें, शिवसेना को 26, शिवसेना (उबाठा) को 15, कांग्रेस को तीन और एनसीपी को चार सीटें मिलीं. छत्रपति संभाजीनगर में भी भाजपा का जीत का सिलसिला जारी रहा. यहां भाजपा ने 57 सीटें जीतीं, शिवसेना को 13 और कांग्रेस को एक सीट मिली, जबकि एसईसी में पंजीकृत अन्य पार्टियों, खासकर एआईएमआईएम, ने 33 सीटें हासिल कीं.
फडणवीस जीत के सबसे बड़े रणनीतिकार के रूप में उभरे
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस चुनाव में भाजपा की जीत के सबसे बड़े रणनीतिकार के रूप में उभरे हैं. भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने 15 जनवरी को हुए चुनाव में 29 में से 25 नगर निगमों में जीत दर्ज की, जिसमें मुंबई भी शामिल है. भाजपा 17 महानगरपालिकाओं में अपने दम पर महापौर बनाने की स्थिति में है. यह 2024 के अंत में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद फडणवीस की सबसे बड़ी चुनावी सफलता मानी जा रही है.
खास बात यह रही कि इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं की भागीदारी बेहद कम रही और पूरी जिम्मेदारी राज्य नेतृत्व पर थी. मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि लोगों ने भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति को वोट दिया क्योंकि वे ईमानदारी और विकास चाहते हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा ने विकास का एजेंडा रखा और लोगों ने उस पर भरोसा जताया. कई नगर निकायों में हमें रिकॉर्ड जनादेश मिला है.
वहीं भाजपा की जीत के बाद शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने हार के लिए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि भाजपा पार्टियां तोड़कर चुनाव जीतती है. बीएमसी नतीजों पर राउत ने कहा कि मुख्यमंत्री के पास पुलिस, पैसा और संसाधन होते हैं, इसलिए नतीजे ऐसे आए. उन्होंने दावा किया कि मुंबई में मुकाबला बराबरी का है और विपक्ष की ताकत सत्तारूढ़ दल के बराबर है.
कुल नतीजे और किन शहरों में हुए चुनाव
अंतिम नतीजों के अनुसार, 2,869 सीटों में से भाजपा ने 1,425, शिवसेना ने 399, कांग्रेस ने 324, राकांपा (एनसीपी) ने 167, शिवसेना (UBT) ने 155, एनसीपी (शरद पवार) ने 36, मनसे ने 13, बसपा ने छह सीटें जीतीं. एसईसी में रजिस्टर्ड अन्य दलों को 129, गैर-मान्यता प्राप्त दलों को 196 और 19 निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली. जिन नगर निकायों में चुनाव हुए, उनमें मुंबई, छत्रपति संभाजीनगर, नवी मुंबई, वसई-विरार, कल्याण-डोंबिवली, कोल्हापुर, नागपुर, सोलापुर, अमरावती, अकोला, नासिक, पिंपरी-चिंचवड़, पुणे, उल्हासनगर, ठाणे, चंद्रपुर, परभणी, मीरा-भायंदर, नांदेड़-वाघाला, पनवेल, भिवंडी-निजामपुर, लातूर, मालेगांव, सांगली-मिराज-कुपवाड, जलगांव, अहिल्यानगर, धुले, जालना और इचलकरंजी शामिल रहे.
भारत आजाद हो चुका था, तिरंगा लालकिले पर लहरा रहा था, लेकिन आजादी की पूरी तस्वीर तब भी अधूरी थी. वजह साफ थी. देश की सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी, यानी भारतीय सेना की कमान अब भी अंग्रेज के हाथों में थी.
आजादी के बाद करीब डेढ़ साल तक एक सवाल लटका रहा कि भारतीय सेना का नेतृत्व आखिर कौन करेगा. उस दौर में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि भारतीय अफसरों के पास अभी इतना अनुभव नहीं है कि वे पूरी सेना संभाल सकें इसलिए किसी ब्रिटिश अधिकारी को ही कमांडर-इन-चीफ बनाया जाना चाहिए.
क्या प्रधानमंत्री भी किसी अंग्रेज को बना लेना चाहिए था ?
एक बैठक में यह बात रखी गई. माहौल अचानक बेहद गंभीर हो गया. ज्यादातर लोग चुप थे, मानो हालात को स्वीकार कर लिया गया हो. तभी उस सन्नाटे को तोड़ते हुए लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौर खड़े हुए. उन्होंने नेहरू से सीधा सवाल किया, “सर, हमारे पास देश चलाने का भी तो कोई अनुभव नहीं था. तो क्या हमें भारत का पहला प्रधानमंत्री भी किसी अंग्रेज को बना लेना चाहिए था?”
यह सवाल किसी हथियार से कम नहीं था. पूरी सभा स्तब्ध रह गई. लेकिन यही वह पल था, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी. नाथू सिंह राठौर ने साफ कह दिया कि भारतीय अफसरों में न सिर्फ क्षमता है, बल्कि देश और सेना को समझने का जज्बा भी है.
नेतृत्व करने से किया इंकार
इसी बातचीत के बाद उनसे कहा गया कि वे खुद सेना प्रमुख क्यों नहीं बन जाते लेकिन उन्होंने अनुशासन और परंपरा की मिसाल पेश की. उन्होंने साफ इंकार कर दिया और कहा, “सेना का नेतृत्व वही करेगा, जो सबसे वरिष्ठ है.”
उस समय सबसे वरिष्ठ अधिकारी थे—KM करिअप्पा. एक ऐसे अफसर, जिन्होंने 1919 में सेना जॉइन की थी, अंग्रेजी दौर में भी कभी दबना नहीं सीखा और भारतीय सैनिकों के सम्मान के लिए लगातार आवाज उठाई. उन्होंने विद्रोह को ताकत से नहीं, समझ और संवाद से संभाला. यही वजह थी कि उनके इलाकों में शांति बनी रहती थी.
KM करिअप्पा बनें सेना अध्यक्ष
बंटवारे के वक्त सेना का टूटना उन्हें भीतर तक तोड़ गया. अफसर, जवान और हथियार—सब कुछ उनकी आंखों के सामने बंटा. इसके बावजूद उन्होंने देश के लिए अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा. आखिरकार, 15 जनवरी 1949 को वह ऐतिहासिक दिन आया, जब KM करिअप्पा ने आखिरी ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल फ्रांसिस रॉय बुचर से कमान संभाली. भारत को अपना पहला भारतीय सेना प्रमुख मिला.
इसी ऐतिहासिक फैसले की याद में हर साल 15 जनवरी को भारतीय थल सेना दिवस मनाया जाता है. एक दिन, जो याद दिलाता है कि आजादी सिर्फ झंडा फहराने से नहीं, बल्कि नेतृत्व अपने हाथ में लेने से पूरी होती है.
क्या बंगाल को मिनी पाकिस्तान बनाने की कोशिश हो रही है, इस मुख्यमंत्री ने ममता सरकार पर लगाया आरोप
जैसे जैसे पश्चिम बंगाल के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक बयानबाजी तेज होती जा रही है. एसआईआर को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र सरकार के साथ टकराव की स्थिति में हैं. उन्होंने मंगलवार को कहा कि 13 जनवरी, 2026 की सुबह तक इस मतदाता विशेष गहन पुनरीक्षण की वजह से 84 लोगों की जान जा चुकी है. उन्होंने कहा कि ये मौतें लोगों को नोटिस मिलने के बाद हुई है. उन्होंने कहा कि भाजपा और चुनाव आयोग को इन मौतों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. वहीं अब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री ने इस मामले पर सीधा प्रहार न करते हुए परोक्ष रूप से हमला किया है. उन्होंने मंगलवार को कहा कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने से कोई रोक नहीं सकता. उन्होंने सत्ताधारी त्रिणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसने राज्य को बर्बाद कर दिया है और उसे ‘मिनी पाकिस्तान’ में बदलने की कोशिश की जा रही है.
अरालिया कम्यूनिटी हॉल में संगठात्मक बैठक में भाजपा की बैठक हुए. इसी दौरान मुख्यमंत्री साहा ने कहा कि तृणमूल योजनाबद्ध तरीके से बर्बादी ला रही है. जिस तरह से पश्चिम बंगाल में एक मिनी पाकिस्तान बनाने की कोशिश की जा रही है, उसके खिलाफ लोग विरोध कर रहे हैं. वे अपनी आवाज उठा रहे हैं. हमें पूरा भरोसा है कि आने वाले दिनों में भाजपा की सरकार जीतेगी और हमें कोई रोक नहीं सकता. उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल कभी वहां जन्मी महान हस्तियों के लिए जाना जाता था, लेकिन टीएमसी ने बंगाल को बर्बाद कर दिया.
सीपीआईएम पर भी आरोप
उन्होंने अपने भाषण में सीपीआईएम पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि डर कमजोरी की निशानी होती है. जो लोग डरते हैं, वह समजा को नहीं बदल सकते. जो कभी सीपीआईएम के खिलाफ लड़े थे, वे अब चुनाव लड़ने के लिए एक साथ आ गए हैं. यह कैसी पॉलिसी है. ये सभी डर के संकेत हैं. हमारे यहां लोकतंत्र है. इसलिए लोग जो चाहे कह सकते हैं. साहा ने सीपीएम को झूठ बोलने में माहिर बताया. उन्होंने कहा कि हमने कभी ‘TTAADC चलो’ जैसा कोई नारा नहीं दिया.
अपने बयान में सीएम कांग्रेस पर टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी को कई मौके मिले थे, वह कुछ कर सकते थे. उन्होंने सीपीआईएम के कुशासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए लोगों को धोखा दिया. अब हम समझ चुके हैं कि सीपीआईएम ने कैसे 35 सालों तक कैसे राज्य पर शासन किया.
कार्यकर्ताओं में भरा जोश
मणिक साहा ने अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरा. इस कार्यक्रम के दौरान सांसद और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राजीब भट्टाचार्य समेत कई नेता मौजूद थे. साहा ने कहा कि हम सभी को काम करना होगा. हमारे पास इसका कोई विकल्प नहीं है. डबल इंजन की सरकार पूरी रफ्तार से काम कर रही है. आने वाले दिनों में सीपीआईएम कहीं नजर नहीं आएगी. उन्होंने आगे कहा कि भाजपा केवल जनता के लिए काम करती है. विपक्ष केवल अपने बारे में सोचता है और घर पर बैठना पसंद करता है.
अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए साहा ने कहा कि सरकार से सुविधाएं लेने के बावजूद वे (विपक्ष) बार-बार अपना रंग बदलते रहते हैं. हम पंडित दीन दयाल उपाध्याय की विचारधारा- मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है का पालन कर रहे हैं. हमें लोगों के लिए काम करना चाहिए. मुख्यमंत्री साहा ने आगे कहा कि 2014 से पहले देश को बहुत कुछ सहना पड़ा. इससे नॉर्थ ईस्ट भी प्रभावित था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद स्थिति बदल गई. हम कोई गुंडा पार्टी नहीं हैं. हम हमला नहीं करते, बल्कि कानून के तहत काम करते हैं. हम न्यू त्रिपुरा के निर्माण के लिए काम कर रहे हैं.
सीपीआईएम से हारी हुई सीटों पर फोकस
उन्होंने टीटीएएडीसी चुनावों में सीपीआईएम की जीती हुई उन 10 सीटों पर ध्यान देने की बात कही, जहां भाजपा पिछड़ गई. उनके अनुसार, सीपीआईएम का शासनकाल केवल हिंसा और आतंक के लिए जाना गया. लोगों की हत्या हो जाती थी और न्यान नहीं मिलता था. लोगों को मदद के लिए पार्टी दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते थे. उन्होंने अपने ही एक मंत्री की हत्या कर दी थी. हालांकि, भाजपा के आने के बाद से अब तक कोई राजनीतिक हत्या नहीं हुई है.