UGC Bill: भाजपा नेता मनोज तिवारी का बड़ा बयान बोले जातिगत भेदभाव को रोकना चाहिए

भाजपा नेता और लोकसभा सांसद मनोज तिवारी ने जातिगत भेदभाव को रोकने की वकालत की है। अपने फेसबुक पेज़ पर उन्होंने लिखा कि भेदभाव को एकजुटता से रोका जाना चाहिए। ये काम साफ नियत से करना चाहिए, सियासी उल्लू सीधा करने के लिए नहीं। और नियम जाति के महीन पिरामिड को समझते हुए बनाए जाने चाहिए।

आपसी रंजिश में फंसाने वाले पर हो कार्रवाई

उन्होंने सुझाव दिया कहा कि सवर्ण छात्र अगर जातिगत भेदभाव करते हैं तो उनपर कार्रवाई हो,मगर उन्हें आपसी रंजिश में फँसाया जाए तो फँसाने वाले पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। क़ानून का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए। अगर कोई OBC वर्ग का छात्र SC/ST वर्ग से भेदभाव करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान क्यों नहीं है? भेदभाव के मामले तो यहां भी होते हैं। मनोज तिवारी ने सवाल करते हुए पूछा कि नए नियमों में OBC वर्ग को भी पीड़ित पक्ष में रखा गया है, तो क्या Gen वर्ग को पहले से ही दोषी मान लिया गया है?

देश के लिए नासूर है जातिगत भेदभाव

    तिवारी ने आगे लिखा कि जातिगत भेदभाव देश के लिए नासूर है। ऐसे मामलों में दोषी के खिलाफ सख़्त सजा का प्रावधान होना चाहिए,मगर निर्दोष को बचने का अवसर भी मिलना चाहिए। 2012 में बने नियम में था कि अगर आरोप ग़लत निकले या फँसाने की मंशा निकली तो जुर्माना लगता था। नए नियम में क्यों नहीं है?

    हर जाति अपने से छोटी जाती खोज रही

    सांसद ने लिखा कि बाक़ी जाति का पिरामिड समझना है तो नियम बनाने वालों को गाँव में घूमकर समझना चाहिए। एसी कमरों में सिर्फ़ हवा ठंडी लगती है,जातिगत गर्माहट नहीं पता लगती।

    अंत में- परसाई जी,सच लिख गए हैं। इस देश में हर जाति ने अपने से छोटी जाति खोज रखी है।

    महानगरपालिकाओं में खिला कमल, बाला साहेब की धरोहर गंवा बैठे उद्धव

    महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव 2026 में भाजपा ने 29 महानगरपालिकाओं में जबरदस्त जीत दर्ज की. बीएमसी से ठाकरे परिवार का 30 साल पुराना वर्चस्व खत्म हुआ. पुणे, नागपुर, नासिक और संभाजीनगर में भी भाजपा का दबदबा कायम रहा. इस चुनाव में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की रणनीति ने महायुति गठबंधन को सफलता दिलाई.
    महाराष्ट्र में 2026 के नगर निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शानदार जीत दर्ज की है. राज्य की 29 महानगरपालिकाओं की कुल 2,869 सीटों में से भाजपा ने 1,425 सीटों पर कब्जा जमाया है. इस जीत के साथ ही भाजपा ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) से उद्धव ठाकरे का नियंत्रण भी छीन लिया है. इसके साथ देश के सबसे अमीर नगर निकाय में ठाकरे परिवार का करीब तीस साल पुराना वर्चस्व खत्म हो गया.

    बीएमसी की 227 सीटों में से भाजपा ने 89 सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी शिवसेना को 29 सीटें मिलीं. शिवसेना (उबाठा) को 65, मनसे को छह सीटें मिलीं. वीबीए के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस को 24 सीटें, एआईएमआईएम को आठ, एनसीपी को तीन, समाजवादी पार्टी को दो और राकांपा (शप) को सिर्फ एक सीट मिली.

    पुणे, नागपुर, नासिक और संभाजीनगर में भी भाजपा का दबदबा

    पुणे नगर निगम चुनाव में भाजपा ने पवार परिवार को बड़ा झटका दिया. यहां भाजपा ने 119 सीटें जीत लीं. अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी 27 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि उसकी सहयोगी एनसीपी (शरद पवार) को तीन सीटें मिलीं. कांग्रेस को यहां सिर्फ 15 सीटें ही मिल सकीं. नागपुर की 151 सदस्यीय महानगरपालिका में भाजपा का दबदबा साफ दिखा और पार्टी ने 102 सीटें जीत लीं, जबकि कांग्रेस को 34 सीटें मिलीं.
    नासिक में भाजपा को 72 सीटें, शिवसेना को 26, शिवसेना (उबाठा) को 15, कांग्रेस को तीन और एनसीपी को चार सीटें मिलीं. छत्रपति संभाजीनगर में भी भाजपा का जीत का सिलसिला जारी रहा. यहां भाजपा ने 57 सीटें जीतीं, शिवसेना को 13 और कांग्रेस को एक सीट मिली, जबकि एसईसी में पंजीकृत अन्य पार्टियों, खासकर एआईएमआईएम, ने 33 सीटें हासिल कीं.

    फडणवीस जीत के सबसे बड़े रणनीतिकार के रूप में उभरे

    महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस चुनाव में भाजपा की जीत के सबसे बड़े रणनीतिकार के रूप में उभरे हैं. भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने 15 जनवरी को हुए चुनाव में 29 में से 25 नगर निगमों में जीत दर्ज की, जिसमें मुंबई भी शामिल है. भाजपा 17 महानगरपालिकाओं में अपने दम पर महापौर बनाने की स्थिति में है. यह 2024 के अंत में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद फडणवीस की सबसे बड़ी चुनावी सफलता मानी जा रही है.

    खास बात यह रही कि इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं की भागीदारी बेहद कम रही और पूरी जिम्मेदारी राज्य नेतृत्व पर थी. मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि लोगों ने भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति को वोट दिया क्योंकि वे ईमानदारी और विकास चाहते हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा ने विकास का एजेंडा रखा और लोगों ने उस पर भरोसा जताया. कई नगर निकायों में हमें रिकॉर्ड जनादेश मिला है.

    वहीं भाजपा की जीत के बाद शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने हार के लिए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि भाजपा पार्टियां तोड़कर चुनाव जीतती है. बीएमसी नतीजों पर राउत ने कहा कि मुख्यमंत्री के पास पुलिस, पैसा और संसाधन होते हैं, इसलिए नतीजे ऐसे आए. उन्होंने दावा किया कि मुंबई में मुकाबला बराबरी का है और विपक्ष की ताकत सत्तारूढ़ दल के बराबर है.

    कुल नतीजे और किन शहरों में हुए चुनाव

    अंतिम नतीजों के अनुसार, 2,869 सीटों में से भाजपा ने 1,425, शिवसेना ने 399, कांग्रेस ने 324, राकांपा (एनसीपी) ने 167, शिवसेना (UBT) ने 155, एनसीपी (शरद पवार) ने 36, मनसे ने 13, बसपा ने छह सीटें जीतीं. एसईसी में रजिस्टर्ड अन्य दलों को 129, गैर-मान्यता प्राप्त दलों को 196 और 19 निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली. जिन नगर निकायों में चुनाव हुए, उनमें मुंबई, छत्रपति संभाजीनगर, नवी मुंबई, वसई-विरार, कल्याण-डोंबिवली, कोल्हापुर, नागपुर, सोलापुर, अमरावती, अकोला, नासिक, पिंपरी-चिंचवड़, पुणे, उल्हासनगर, ठाणे, चंद्रपुर, परभणी, मीरा-भायंदर, नांदेड़-वाघाला, पनवेल, भिवंडी-निजामपुर, लातूर, मालेगांव, सांगली-मिराज-कुपवाड, जलगांव, अहिल्यानगर, धुले, जालना और इचलकरंजी शामिल रहे.

    थल सेना दिवस – नेहरु के सामने का वो सवाल जिसने सेना की दिशा बदल दी

    भारत आजाद हो चुका था, तिरंगा लालकिले पर लहरा रहा था, लेकिन आजादी की पूरी तस्वीर तब भी अधूरी थी. वजह साफ थी. देश की सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी, यानी भारतीय सेना की कमान अब भी अंग्रेज के हाथों में थी. 

    आजादी के बाद करीब डेढ़ साल तक एक सवाल लटका रहा कि भारतीय सेना का नेतृत्व आखिर कौन करेगा. उस दौर में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि भारतीय अफसरों के पास अभी इतना अनुभव नहीं है कि वे पूरी सेना संभाल सकें इसलिए किसी ब्रिटिश अधिकारी को ही कमांडर-इन-चीफ बनाया जाना चाहिए.

    क्या प्रधानमंत्री भी किसी अंग्रेज को बना लेना चाहिए था ?

    एक बैठक में यह बात रखी गई. माहौल अचानक बेहद गंभीर हो गया. ज्यादातर लोग चुप थे, मानो हालात को स्वीकार कर लिया गया हो. तभी उस सन्नाटे को तोड़ते हुए लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौर खड़े हुए. उन्होंने नेहरू से सीधा सवाल किया, “सर, हमारे पास देश चलाने का भी तो कोई अनुभव नहीं था. तो क्या हमें भारत का पहला प्रधानमंत्री भी किसी अंग्रेज को बना लेना चाहिए था?”

    यह सवाल किसी हथियार से कम नहीं था. पूरी सभा स्तब्ध रह गई. लेकिन यही वह पल था, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी. नाथू सिंह राठौर ने साफ कह दिया कि भारतीय अफसरों में न सिर्फ क्षमता है, बल्कि देश और सेना को समझने का जज्बा भी है.

    नेतृत्व करने से किया इंकार

    इसी बातचीत के बाद उनसे कहा गया कि वे खुद सेना प्रमुख क्यों नहीं बन जाते लेकिन उन्होंने अनुशासन और परंपरा की मिसाल पेश की. उन्होंने साफ इंकार कर दिया और कहा, “सेना का नेतृत्व वही करेगा, जो सबसे वरिष्ठ है.”

    उस समय सबसे वरिष्ठ अधिकारी थे—KM करिअप्पा. एक ऐसे अफसर, जिन्होंने 1919 में सेना जॉइन की थी, अंग्रेजी दौर में भी कभी दबना नहीं सीखा और भारतीय सैनिकों के सम्मान के लिए लगातार आवाज उठाई. उन्होंने विद्रोह को ताकत से नहीं, समझ और संवाद से संभाला. यही वजह थी कि उनके इलाकों में शांति बनी रहती थी.

    KM करिअप्पा बनें सेना अध्यक्ष

    बंटवारे के वक्त सेना का टूटना उन्हें भीतर तक तोड़ गया.  अफसर, जवान और हथियार—सब कुछ उनकी आंखों के सामने बंटा. इसके बावजूद उन्होंने देश के लिए अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा. आखिरकार, 15 जनवरी 1949 को वह ऐतिहासिक दिन आया, जब KM करिअप्पा ने आखिरी ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल फ्रांसिस रॉय बुचर से कमान संभाली. भारत को अपना पहला भारतीय सेना प्रमुख मिला.

    इसी ऐतिहासिक फैसले की याद में हर साल 15 जनवरी को भारतीय थल सेना दिवस मनाया जाता है. एक दिन, जो याद दिलाता है कि आजादी सिर्फ झंडा फहराने से नहीं, बल्कि नेतृत्व अपने हाथ में लेने से पूरी होती है.

    (निशांत कुमार, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं -साभार )